
क्या उपभोक्ता अदालतों से आम जनता का भरोसा अब डगमगाने लगा है? नए उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम में उपभोक्ताओं को जल्दी न्याय दिलाने के कड़े इंतज़ाम किए गए हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इसके ठीक उलट नज़र आ रही है। उत्तराखंड के जिला और राज्य उपभोक्ता आयोगों में मुकदमों के निपटारे की रफ्तार इतनी धीमी है कि लोग अब राहत की उम्मीद छोड़कर आयोग का दरवाजा खटखटाने से कतराने लगे हैं।
उपभोक्ता न्याय की सुस्त रफ्तार से घटे केस
कानून के मुताबिक उपभोक्ता से जुड़े किसी भी मामले का निपटारा 3 महीने में और प्रयोगशाला (लैब) जांच वाले मामलों में 5 महीने के भीतर होना चाहिए। इसके बावजूद राज्य के आयोगों में दर्जनों केस ऐसे हैं, जो पिछले 10 से 15 सालों से तारीख-दर-तारीख फैसले का इंतज़ार कर रहे हैं।
RTI से हुआ चौंकाने वाला खुलासा
काशीपुर निवासी सूचना अधिकार कार्यकर्ता नदीम उद्दीन ने उत्तराखंड राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतित्तोष आयोग से मामलों के निपटारे और पेंडिंग (लंबित) मुकदमों को लेकर जानकारी मांगी थी। लोक सूचना अधिकारी वंदना शर्मा द्वारा मुहैया कराए गए आंकड़ों ने व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है।
अप्रैल 2016 की शुरुआत तक राज्य उपभोक्ता आयोग में 701 मूल परिवाद और 1,401 प्रथम अपीलें पेंडिंग थीं। वहीं, राज्य के 13 जिला आयोगों में कुल 3,127 केस पेंडिंग थे। सालों से लटके इन मुकदमों का ब्यौरा बेहद चिंताजनक है:
10 साल से अधिक पुराने मामले: राज्य आयोग में दर्ज अपीलों में से 27 केस 10 साल से भी ज़्यादा पुराने हैं। वहीं 125 केस पूरे 10 साल से, 148 केस 7 साल से और 201 केस 5 साल से लटके हुए हैं।
मूल परिवादों की हालत: राज्य आयोग के अपने मूल मामलों में 9 केस 10 वर्ष से अधिक समय से और 22 केस 10 वर्ष से लंबित हैं।
जिलेवार स्थिति: प्रदेश के सभी 13 जिलों में मिलाकर 26 मुकदमे 10 साल से ज़्यादा पुराने हैं, 62 मुकदमे 10 साल से, 217 मुकदमे 7 साल से और 647 मुकदमे पिछले 5 सालों से फैसले की राह देख रहे हैं।
सालों-साल घट रही है शिकायतकर्ताओं की संख्या
आबादी बढ़ने के साथ-साथ बाज़ार में ग्राहकों और ख़रीदारी की संख्या तो लगातार बढ़ी है, लेकिन ठगे जाने पर उपभोक्ता आयोग जाने वालों की तादाद तेज़ी से गिरी है। इसकी सबसे बड़ी वजह न्याय मिलने में होने वाली अत्यधिक देरी है। सालाना आंकड़े साफ बताते हैं कि लोगों का रुझान किस ओर जा रहा है। 2016 में राज्य उपभोक्ता आयोग में 292 और जिला आयोगों में 1,462 केस दर्ज हुए थे। 2019 में राज्य आयोग में 468 और जिला आयोगों में 1,365 केस दर्ज हुए। 2023 में आंकड़े गिरकर तीन अंकों में आ सिमटे। राज्य आयोग में महज़ 116 और जिला आयोगों में 970 केस ही आए। 2024 में अब तक का सबसे कम आंकड़ा रहा। राज्य आयोग में सिर्फ़ 29 और जिला आयोगों में मात्र 574 मामले दर्ज हुए। 2025 में राज्य आयोग में 134 और जिला आयोगों में 776 शिकायतें दर्ज की गईं। 2026 में अप्रैल तक यानी शुरुआती चार महीनों में राज्य आयोग में 58 और जिला आयोगों में सिर्फ़ 311 मुकदमे ही सामने आए हैं।
बीमा और बैंकिंग सेक्टर से सबसे ज़्यादा शिकायतें
राज्य आयोग के गठन से लेकर 31 मार्च 2026 तक के आंकड़ों पर नज़र डालें तो सबसे ज़्यादा मामले बीमा कंपनियों की धोखाधड़ी और मनमानी से जुड़े आए हैं।
बीमा (Insurance): आयोग में सबसे ज़्यादा 130 मूल परिवाद और 2,261 अपीलें बीमा क्षेत्र से जुड़ी दर्ज हुई हैं।
बैंकिंग: दूसरे नंबर पर बैंक से जुड़े मामले रहे, जिनमें 27 मूल परिवाद और 566 अपीलें दर्ज की गईं।
बिजली व बिल्डर्स: बिजली विभाग से जुड़ी 8 परिवाद व 391 अपीलें दर्ज हुईं। प्राइवेट सोसाइटी और बिल्डर्स के खिलाफ 67 परिवाद और 186 अपीलें दायर की गईं।
मेडिकल लापरवाही व अन्य: डॉक्टर या अस्पताल की लापरवाही के 41 परिवाद और 207 अपीलें आई हैं।
इसके अलावा शिक्षा (189 अपीलें), डाकिया/डाक विभाग (151 अपीलें), टेलीकॉम (141 अपीलें), सरकारी हाउसिंग (80 अपीलें) और रेलवे (31 अपीलें) से जुड़े मामले भी आयोग तक पहुंचे हैं।
उपभोक्ता संरक्षण कानून का असल मकसद हो जाएगा ख़त्म !
उपभोक्ताओं का कहना है कि जब हर्जाना या रिफंड पाने के लिए 10-10 साल कोर्ट के चक्कर काटने पड़ें, तो आम आदमी शिकायत दर्ज कराने का झंझट ही छोड़ देता है। अगर उपभोक्ता अदालतों में खाली पड़े पदों को भरकर मुकदमों के निपटारे की रफ्तार नहीं बढ़ाई गई, तो उपभोक्ता संरक्षण कानून का असल मकसद ही ख़त्म हो जाएगा।
