उत्तराखण्ड

अब एआई भी बोलेगा पहाड़ी बोली! सीएम धामी ने शुरू किया गढ़वाली, कुमाऊँनी, जौनसारी का ‘वॉइस पोर्टल’

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Now, AI will also speak Pahari dialects! CM Dhami launches a 'voice portal' for Garhwali, Kumaoni, and Jaunsari.

क्या आपने कभी सोचा है कि आपका फोन या कंप्यूटर आपसे आपकी अपनी गढ़वाली, कुमाऊँनी या जौनसारी भाषा में बात करे? सुनने में यह किसी सपने जैसा लगता है, लेकिन अब यह बहुत जल्द सच होने जा रहा है! जी हाँ, उत्तराखंड की प्यारी लोकभाषाओं और बोलियों को डिजिटल दुनिया में नई पहचान देने के लिए एक बहुत ही शानदार और अनोखी शुरुआत हुई है।

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मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अपने कैम्प कार्यालय में एआई स्ट्रैटेजिक इंजीनियरिंग (AiSE) फाउंडेशन की ‘भाषा एआई’ (Bhasha AI) पहल के तहत एक विशेष ‘वॉइस कलेक्शन पोर्टल’ की शुरुआत की है। इस अभियान का आगाज़ खुद मुख्यमंत्री की कुमाऊँनी भाषा में रिकॉर्ड की गई एक प्यारी सी वॉइस क्लिप के साथ हुआ।

आखिर क्या है यह ‘भाषा एआई’ पहल?

आसान शब्दों में समझें तो आजकल दुनिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का बोलबाला है। गूगल, एलेक्सा या चैटजीपीटी जैसी तकनीकें अंग्रेजी या हिंदी तो समझ लेती हैं, लेकिन हमारी अपनी गढ़वाली, कुमाऊँनी और जौनसारी बोलियों को नहीं समझ पातीं। इसी दूरी को मिटाने के लिए एआईएसई (AiSE) फाउंडेशन के संस्थापक सचिदानंद सेमवाल और उनकी टीम ने ‘भाषा एआई’ की शुरुआत की है। इस पोर्टल के ज़रिए उत्तराखंड के अलग-अलग कोनों से लोगों की आवाज़ों, लोकभाषाओं के शब्दों और उनके बोलने के खास अंदाज़ (उच्चारण) का एक बड़ा डिजिटल खजाना यानी वॉइस कलेक्शन तैयार किया जा रहा है। इसका सीधा मकसद यह है कि आने वाले समय में एआई तकनीक भी हमारी अपनी बोलियों में बातचीत कर सके।

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अपनी बोली में मिलेगी  सरकारी योजनाओं की जानकारी

कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस पहल की दिल खोलकर तारीफ की। उन्होंने कहा, “हमारी बोली-भाषाएं ही हमारी असली पहचान हैं। अपनी संस्कृति, लोककला और परंपराओं को बचाए रखने के लिए आज के ज़माने की तकनीक का इस्तेमाल करना बेहद ज़रूरी हो गया है।” मुख्यमंत्री ने एक बहुत ही काम की बात कही। उन्होंने बताया कि राज्य  सरकार चाहती है कि उत्तराखंड के दूर-दराज और सीमांत गाँवों में रहने वाला आम नागरिक भी अपनी ही बोली में सरकारी योजनाओं की जानकारी पा सके और अपनी बात भी सरकार तक आसानी से पहुँचा सके। जब एआई तकनीक हमारी गढ़वाली, कुमाऊँनी और जौनसारी को सही तरीके से समझ पाएगी, तभी यह संभव हो पाएगा। सीएम ने यह भी ध्यान दिलाया कि हमारे उत्तराखंड में थोड़ी-थोड़ी दूरी पर शब्दों को बोलने का लहज़ा और उच्चारण बदल जाता है। इस पोर्टल पर जब राज्य के अलग-अलग हिस्सों से लोग अपनी आवाज़ अपलोड करेंगे, तो एआई के लिए हमारी विविधताओं को समझना और आसान हो जाएगा। यह पहल हमारी आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़े रखने में बहुत मददगार साबित होगी।

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संस्कृति और संगीत के दिग्गजों का मिला साथ

इस खास मौके पर उत्तराखंड के जाने-माने लोकगायक और पद्मश्री प्रीतम भरतवाण भी मौजूद थे। उन्होंने खुशी जताते हुए कहा कि हमारी लोकभाषाओं में हमारे जागर, लोकगीत और सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत बसी हुई है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि ‘जागर अकादमी’ इस अभियान में स्थानीय बोलियों के सही उच्चारण और उनकी मौलिकता को बनाए रखने के लिए पूरा सहयोग करेगी। इस कार्यक्रम के दौरान शक्ति प्रसाद भट्ट, गजेंद्र नौटियाल, अनिरुद्ध रैथवान, निधि सेमवाल, अनिल गोदियाल, डॉ. जे.के. पांडे और देव रतूड़ी समेत कई गणमान्य लोग मौजूद रहे।

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News100Live Desk
टीम न्यूज़ 100 लाइव