
धान खरीद में देरी ने खोली सरकारी तैयारियों की पोल, सड़क पर उतरा किसान!
खटीमा से रुद्रपुर तक बढ़ता आक्रोश, कहीं मंडी गेट पर धरना तो कहीं हाईवे जाम!
एक अक्टूबर की घोषणा, पांच अक्टूबर का आश्वासन भी बेअसर—किसान पूछ रहे, सरकारी खरीद आखिर शुरू कब होगी?
रुद्रपुर। धान की कटाई के साथ खेतों से मंडियों तक पहुंची किसानों की फसल अब सरकारी खरीद व्यवस्था की सुस्ती के बीच अटकती नजर आ रही है। प्रदेश में सरकारी धान खरीद शुरू नहीं होने को लेकर किसानों का आक्रोश अब मंडियों की चारदीवारी से निकलकर सड़क तक पहुंच गया है। खटीमा में किसानों ने मंडी गेट पर धरना देकर प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी की तो रुद्रपुर में गुस्साए किसानों ने हाईवे पर बैठकर जाम लगा दिया। दोनों घटनाएं महज विरोध-प्रदर्शन नहीं, बल्कि धान खरीद व्यवस्था को लेकर सरकार के सामने खड़ा होता बड़ा सवाल हैं।
खटीमा में प्रशासन की ओर से पांच अक्टूबर से मंडी परिसर में धान की तौल शुरू करने का आश्वासन दिए जाने के बावजूद सोमवार को तौल शुरू नहीं हुई। इससे नाराज भारतीय किसान यूनियन और किसानों ने मंडी गेट पर धरना शुरू कर दिया। भाकियू जिलाध्यक्ष गुरसेवक सिंह के नेतृत्व में किसानों ने प्रशासन के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। धरने में विधायक भुवन कापड़ी भी पहुंचे और किसानों के समर्थन में धरने पर बैठ गए।
दरअसल, एक अक्टूबर को किसान धान से लदी पांच ट्रैक्टर-ट्रॉलियां लेकर मंडी पहुंचे थे, लेकिन तौल शुरू नहीं होने पर किसानों ने मंडी गेट बंद कर धरना शुरू कर दिया था। मौके पर पहुंचे एसडीएम तुषार सैनी ने बातचीत के बाद पांच अक्टूबर से धान तौल शुरू कराने का आश्वासन दिया था। किसानों ने भरोसा करते हुए आंदोलन समाप्त कर दिया, लेकिन तय तारीख आने के बाद भी जब तौल शुरू नहीं हुई तो किसानों का भरोसा फिर टूट गया।
खटीमा विधायक भुवन कापड़ी ने आरएफसी से बातचीत की तो मिलरों के तैयार नहीं होने की बात सामने आई। विधायक के अनुसार मिलरों से बातचीत में यह जानकारी सामने आई कि पिछले वर्ष करीब 20 लाख रुपये की बैंक गारंटी के मुकाबले इस वर्ष इसे बढ़ाकर 2.5 करोड़ रुपये कर दिया गया है। उनका कहना था कि बैंक गारंटी में इतनी बड़ी वृद्धि के कारण मिलरों की क्रय प्रक्रिया में रुचि प्रभावित हो रही है और इसका सीधा खामियाजा किसानों को भुगतना पड़ रहा है।
उधर, रुद्रपुर में सरकारी धान खरीद शुरू नहीं होने से किसानों का गुस्सा और उग्र हो गया। जिले के अलग-अलग क्षेत्रों से बड़ी संख्या में किसान गल्ला मंडी पहुंचे और सरकारी क्रय केंद्रों पर तत्काल खरीद शुरू कराने की मांग की। प्रशासनिक अधिकारियों के मौके पर पहुंचने और किसानों की समस्याएं सुनने में देरी से नाराज किसानों ने मंडी से बाहर निकलकर हाईवे की एक लेन पर जाम लगा दिया। इससे स्कूली बसों, ट्रकों और अन्य वाहनों की लंबी कतार लग गई।
किसानों का आरोप है कि धान की कटाई शुरू हुए कई दिन बीत चुके हैं और बड़ी मात्रा में फसल बाजार में पहुंच चुकी है, लेकिन सरकारी खरीद व्यवस्था अभी तक पूरी तरह पटरी पर नहीं आ सकी है। कहीं पोर्टल की समस्या बताई जा रही है तो कहीं श्रमिकों की कमी का हवाला दिया जा रहा है। किसानों का कहना है कि ऐसी स्थिति में उनके सामने तैयार फसल को बेचने की मजबूरी खड़ी हो गई है।
सबसे बड़ा सवाल धान के भाव को लेकर है। किसानों का आरोप है कि सरकारी खरीद शुरू नहीं होने के कारण उन्हें निजी व्यापारियों को लगभग 1600 से 1700 रुपये प्रति क्विंटल की दर पर धान बेचने को मजबूर होना पड़ रहा है। यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो सरकारी खरीद व्यवस्था की देरी का सीधा आर्थिक बोझ किसान की जेब पर पड़ेगा।
सरकार के लिए अब चेतावनी का समय!
धान की खरीद कोई अचानक सामने आया संकट नहीं है। किसानों की फसल कब तैयार होगी, मंडियों में कब पहुंचेगी, क्रय केंद्र कब खुलेंगे, मिलरों की व्यवस्था क्या होगी और तौल के लिए श्रमिक व तकनीकी संसाधन कितने चाहिए—इन सभी बिंदुओं की तैयारी फसल सीजन से पहले की जानी चाहिए थी।
अगर एक अक्टूबर से खरीद शुरू करने की घोषणा हुई थी तो पांच अक्टूबर तक भी व्यवस्था पटरी पर क्यों नहीं आ सकी? यदि मिलर तैयार नहीं थे तो सरकार और प्रशासन ने पहले से इसका समाधान क्यों नहीं निकाला? और यदि बैंक गारंटी की शर्त में भारी बदलाव खरीद प्रक्रिया में बाधा बन रहा है तो उसका खामियाजा किसान क्यों भुगते?
ये सवाल अब केवल खटीमा या रुद्रपुर के किसानों के नहीं हैं। यह पूरे धान उत्पादक क्षेत्र की चिंता है।
किसान को अपनी फसल खेत में रोककर रखने की क्षमता नहीं होती। कटाई के बाद फसल बेचनी ही पड़ती है। ऐसे में सरकारी खरीद केंद्र समय पर नहीं खुलते और किसान मजबूरी में निजी व्यापारियों के पास कम कीमत पर उपज बेचता है तो सरकारी समर्थन मूल्य की पूरी व्यवस्था ही सवालों के घेरे में आ जाती है।
सरकार को यह समझना होगा कि किसान का आंदोलन किसी राजनीतिक दल का कार्यक्रम नहीं, उसकी मजबूरी की आवाज भी हो सकता है। मंडी गेट पर बैठा किसान और हाईवे पर जाम लगाता किसान सरकार को यही संदेश दे रहा है कि उसकी फसल तैयार है, लेकिन खरीद व्यवस्था तैयार नहीं है।
अब जरूरत आश्वासन की नहीं, जमीन पर तत्काल खरीद शुरू कराने की है। सरकार को धान खरीद केंद्रों की वास्तविक स्थिति सार्वजनिक करनी चाहिए, पोर्टल और श्रमिकों से जुड़ी तकनीकी समस्याओं का तत्काल समाधान करना चाहिए और मिलरों से जुड़े विवादों का समाधान निकालकर यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सरकारी खरीद में देरी का नुकसान किसान को न उठाना पड़े।
क्योंकि किसान की फसल खेत में खड़ी रहेगी तो मौसम का खतरा है और मंडी में खड़ी रहेगी तो बाजार का। दोनों परिस्थितियों में नुकसान किसान का ही है।
सरकार के सामने अब सीधा सवाल है—घोषणाएं होंगी या धान की तौल भी शुरू होगी



