उत्तराखण्ड

SIR: उत्तराखंड में सवा नौ लाख लोगों के वोट पर ‘डिजिटल सर्जिकल स्ट्राइक’?, नागरिकता पर आएगा संकट!

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उत्तराखंड में सवा नौ लाख लोगों के वोट पर 'डिजिटल सर्जिकल स्ट्राइक'?

भारत में ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ को लोकतंत्र का सबसे पवित्र स्तंभ माना गया है। लेकिन जब यही स्तंभ आंकड़ों की भूलभुलैया, सॉफ्टवेयर के एल्गोरिदम और फर्जी आपत्तियों के दलदल में उलझ जाए, तो सवाल उठना लाजिमी है। उत्तराखंड में निर्वाचन आयोग द्वारा चलाए जा रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान ने राज्य की  राजनीति और प्रशासनिक हलकों में भूचाल ला दिया है। 

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उत्तराखंड में सवा नौ लाख लोगों के वोट पर ‘डिजिटल सर्जिकल स्ट्राइक’?

प्रक्रिया के पहले चरण (ड्राफ्ट वोटर लिस्ट) में अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत और डुप्लीकेट के नाम पर 8 लाख 26 हजार 977 वोटरों के नाम सूची से उड़ा दिए गए। इसके बाद दूसरे चरण (दावे व आपत्तियों) में 1.73 लाख फॉर्म-7 के जरिए 95,000 और मतदाताओं को ‘अयोग्य’ करार दे दिया गया। कुल मिलाकर देखें तो फिलहाल लगभग सवा नौ लाख मतदाता इस पूरी प्रक्रिया में अपना मताधिकार गंवाने की कगार पर खड़े हैं। दूसरी ओर, चुनाव आयोग के शीर्ष स्तर पर मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के फैसलों के खिलाफ दो निर्वाचन आयुक्तों के बगावती सुरों ने इस पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर संवैधानिक प्रश्न खड़े कर दिए और विपक्ष के आरोपों की लगभग पुष्टि कर दी है। देश में चुनाव आयोग पर तानाशाही के आरोप लग रहे हैं। उसकी निष्पक्षता पर इतने गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। शायद देश में पहली बार है कि किसी मुख्य चुनाव आयुक्त पर देशद्रोह के आरोप लगाए जा रहे हैं। उसके इस्तीफे और उसकी गिरफ्तारी की मांग हो रही है। महाभियोग चलाने की बात हो रही है।  

पहली ड्राफ्ट लिस्ट से ही ‘सफाया’ और फर्जी आपत्तियों का खेल

उत्तराखंड में SIR प्रक्रिया की शुरुआत ही बड़े झटके के साथ हुई। 14 जुलाई को जारी पहली ड्राफ्ट मतदाता सूची में 2022 की अंतिम सूची (79.6 लाख) के मुकाबले मतदाताओं की संख्या घटकर 71.33 लाख रह गई। अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत और डुप्लीकेट वोटर बताकर एक झटके में करीब 8.26 लाख नाम हटा दिए गए। इतनी बड़ी संख्या में नाम हटना यह दर्शाता है कि या तो 2022 की सूची में भारी गड़बड़ी थी, या फिर बिना जमीनी स्तर पर पुख्ता भौतिक सत्यापन के बड़े पैमाने पर नाम छांट दिए गए।

इसके बाद दूसरे चरण में नाम हटाने के लिए 1.73 लाख फॉर्म-7 आवेदनों की बाढ़ आ गई। मुख्य निर्वाचन अधिकारी डॉ. बी.वी.आर.सी. पुरुषोत्तम के अनुसार, इनमें से 95,000 से अधिक मतदाताओं को ‘लॉजिकल डिसक्रेपेंसी’ (तार्किक विसंगति) के नाम पर नोटिस दिए गए और सुनवाई में उपस्थित न होने पर “अयोग्य” घोषित कर दिया गया। इसी दौरान जांच में यह सनसनीखेज खुलासा हुआ कि पूरे प्रदेश में करीब 20,000 आपत्तियां पूरी तरह फर्जी थीं। केवल ऊधमसिंह नगर जिले में एक भाजपा नेता के नाम से 6,000 से अधिक आपत्तियां दर्ज कराई गई थीं, जो जांच में फर्जी निकलीं। पूर्व कांग्रेस विधायक मनोज रावत ने भी खुलासा किया कि पार्टी विधायक फुरकान अहमद का नाम कटवाने के लिए किसी हमनाम व्यक्ति के नाम से फर्जी आपत्ति दाखिल की गई, जबकि उस व्यक्ति ने इससे साफ इनकार किया। 

इरोनेट का चक्रव्यूह और फॉर्म-6 का ‘ट्रैप’

इस पूरे विवाद के केंद्र में चुनाव आयोग के सॉफ्टवेयर ERONET (इरोनेट) और ईसीआईनेट है। ये सॉफ्टवेयर नाम की मामूली स्पेलिंग मिस्टेक, रिश्तेदारों की उम्र में तार्किक अंतर या परिवार में 6 से अधिक बच्चे होने जैसी स्थिति को ऑटोमैटिक ‘लॉजिकल डिसक्रेपेंसी’ के रूप में फ्लैग कर देता है। इसके बाद अधिकारी सिस्टम पर मतदाता को ‘अयोग्य’ मार्क करते हैं, जिससे स्वचालित रूप से (ऑटो-जनरेटेड) नाम हटाने का फॉर्म-7 जनरेट हो जाता है।

आयोग का तर्क है कि जिन 95,000 लोगों के नाम कटे हैं, वे 3 अक्टूबर को अंतिम सूची आने के बाद फॉर्म-6 भरकर नाम जुड़वा सकते हैं। लेकिन जानकारों के मुताबिक यह एक प्रशासनिक भुलभुलैया है, क्योंकि फॉर्म-6 मुख्य रूप से नए (प्रथम) मतदाताओं के लिए होता है। पुराने वोटरों द्वारा इसे भरने पर ‘गलत ब्योरा’ देने का कानूनी खतरा मंडरा सकता है।

दिल्ली में राहुल गांधी का हमला और राज्यों में उग्र आंदोलन की चेतावनी

एसआईआर की इस प्रक्रिया को लेकर अब राष्ट्रीय स्तर पर भी तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। नई दिल्ली में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने एक विशेष प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर एसआईआर प्रणाली और चुनाव आयोग की भूमिका पर सीधे सवाल खड़े किए। उन्होंने आरोप लगाया कि ‘लॉजिकल डिसक्रेपेंसी’ के नाम पर एक लक्षित रणनीति के तहत विपक्ष-समर्थक और गरीब मतदाताओं के नाम छांटे जा रहे हैं। बीते दिनों सबर इंस्टीट्यूट की प्राथमिक अध्ययन रिपोर्ट में भी यह साफ हुआ था कि ऐसा हो रहा है और उत्तराखंड में पहाड़ की तुलना में मैदानी क्षेत्रों में, समुदायों के नजरिए से देखें तो मुसलमानों, महिलाओं के मताधिकार पर एसआईआर की ज्यादा मार पड़ी है। बहरहाल, दिल्ली से उठी इस आवाज का सीधा असर उत्तराखंड की  राजनीति पर भी दिख रहा है। विपक्षी दलों, नागरिक संगठनों और जनांदोलनकारी समूहों ने इसे जनमत का अपहरण करार देते हुए राज्य भर में उग्र आंदोलन की चेतावनी दी है। चेतावनी दी गई है कि यदि 3 अक्टूबर की अंतिम सूची में धांधली कर काटे गए जायज मतदाताओं के नाम तुरंत बहाल नहीं किए गए, तो राज्यव्यापी चक्का जाम किया जाएगा। 

प्रचारअभियान और चुनाव

सियासी घमासान, जनहित याचिका और चुनाव आयोग में ‘गृहयुद्ध’

25 सितंबर को उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष गणेश गोदियाल, प्रदेश प्रभारी कुमारी सैलजा, नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य, पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत समेत तमाम वरिष्ठ नेताओं के नेतृत्व में कांग्रेसियों ने देहरादून में सचिवालय का घेराव किया और मुख्य निर्वाचन आयुक्त का पुतला जलाया। राष्ट्रपति को भेजे ज्ञापन में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने, सभी फॉर्म-7 आवेदनों का ब्योरा सार्वजनिक करने और शत-प्रतिशत भौतिक सत्यापन की मांग की गई। उधर, सामाजिक कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज और अमृता जोहरी ने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि स्पेलिंग या परिवार के आकार जैसे मामूली तकनीकी आधार पर नागरिकों को उनके सबसे बड़े लोकतांत्रिक अधिकार से बेदखल किया जा रहा है।

इसी बीच ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की खोजी रिपोर्ट में सबसे गंभीर खुलासा हुआ कि भारत निर्वाचन आयोग के भीतर ही ‘गृहयुद्ध’ छिड़ गया है। पिछले 10 महीनों में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के फैसलों पर 14 बार लिखित असहमति दर्ज कराई है। दोनों आयुक्तों ने नियमों में बदलावों को “गैरकानूनी, अनधिकृत और युवाओं का उत्पीड़न” बताते हुए दिल्ली से ‘केंद्रीकृत’ तरीके से वोटर डेटाबेस में फेरबदल पर चिंता जताई है। 

‘एक व्यक्ति, एक वोट’ के सिद्धांत को धता और VIP दोहरा मापदंड

एसआईआर प्रक्रिया के तहत इरोनेट सॉफ्टवेयर की गड़बड़ियों से पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, विदेश मंत्री एस. जयशंकर, दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, सीबीआई निदेशक प्रवीण सूद और पूर्व सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी जैसी हस्तियों तक को नोटिस जारी हो गए।

हालांकि, हंगामा होते ही दिल्ली के चुनाव कार्यालय ने तुरंत जांच कर मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता समेत कई हस्तियों के नाम सूची में बहाल कर दिए। साफ दिख रहा है कि कागजों पर तो संविधान और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम-1950 के तहत सभी मतदाता समान हैं। लेकिन वीआईपी हस्तियों का नाम तेजी से बहाल होना और उत्तराखंड के 95,000 आम व गरीब नागरिकों को ईआरओ कार्यालयों के चक्कर काटने के लिए मजबूर करना यह साबित करता है कि व्यावहारिक धरातल पर प्रणाली दोहरे मापदंड से काम कर रही है।

संवैधानिक संस्था की साख पर बट्टा

उत्तराखंड में पहली ड्राफ्ट सूची में सवा आठ लाख से ज्यादा नाम गायब होना, फिर 20,000 फर्जी आपत्तियों का पाया जाना और 95,000 वोटरों को अयोग्य ठहराना यह साबित करता है कि एसआईआर की आड़ में प्रक्रियात्मक और तकनीकी खामियों का एक बड़ा मकड़जाल तैयार हो चुका है। प्रदेश में 24लाख से ज्यादा लोगों को नोटिस भेजे गए थे ऐसे में 3 अक्टूबर को जब उत्तराखंड की अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित होगी, तब यह साफ हो जाएगा कि लोकतंत्र के इस ‘सफाई अभियान’ में कितनी शुचिता आई और कितने जायज नागरिक मताधिकार से हाथ धो बैठे। 

चुनाव आयोग की साख तभी बहाल हो सकती है जब फर्जी आपत्तियां दाखिल करने वालों पर आपराधिक मुकदमे दर्ज हों, डिजिटल ‘ऑटो-रिमूवल’ की जगह शत-प्रतिशत भौतिक सत्यापन लागू हो, और पारदर्शी संवैधानिक प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित किया जाए।

चुनाव आयुक्तों के चुनाव में सत्ताधारी दल के वर्चस्व ने शुरु किया संकट

‘मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023’ के तहत चयन समिति से मुख्य न्यायाधीश (CJI) को हटाकर एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल किया गया है। प्रधानमंत्री, उनके द्वारा नामित मंत्री और विपक्ष के नेता की इस 3-सदस्यीय समिति में  सरकार का दो-एक का बहुमत तय हो जाता है। इससे सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जिस संस्था का काम ही निष्पक्ष चुनाव कराना है, उसके प्रमुखों का चयन केवल सत्ताधारी दल के नियंत्रण में कैसे हो सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ (2023) मामले में स्पष्ट किया था कि चुनाव आयोग को कार्यपालिका के सीधे प्रभाव से मुक्त रखना लोकतंत्र के लिए अनिवार्य है। जब सरकार ने कानून बनाकर अदालत द्वारा तय समिति से सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को बाहर कर दिया, तो सवाल हुआ है कि क्या विधायिका, न्यायपालिका द्वारा निर्धारित ‘स्वतंत्र चयन’ के संवैधानिक सिद्धांत को कमजोर कर रही है? हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की पीठ ने इस 2023 के कानून की वैधता की सुनवाई को संविधान पीठ के पास भेजने का आदेश दिया। इस दौरान आयोग के भीतर आयुक्तों के बीच फैसलों पर दर्ज मतभेदों की खबरें भी सामने आई हैं। इससे यह सवाल उठता है कि जब संस्था के भीतर ही आम सहमति और पारदर्शिता का अभाव दिखता है, तो जनता का उस पर विश्वास कैसे कायम रहेगा? 

बीते विधानसभा चुनावों में आचार संहिता के उल्लंघन की शिकायतों पर कार्रवाई में असमानता, मतदाता सूचियों तमाम गड़बड़ियों और नतीजों के अंतर को लेकर सवाल उठे हैं। सवाल यह है कि यदि ‘अंपायर’ का चुनाव खुद एक टीम का कप्तान करेगा, तो क्या चुनाव मैदान सभी दलों के लिए समान (लेवल प्लेइंग फील्ड) रह पाएगा? यह पूरी स्थिति दर्शाती है कि चुनाव आयोग का संकट केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की विश्वसनीयता और संवैधानिक संतुलन से जुड़ा हुआ है।

सवा नौ लाख लोगों की नागरिकता पर अप्रत्यक्ष खतरा

हालांकि मतदाता सूची से नाम कटने का सीधा असर किसी व्यक्ति की नागरिकता पर नहीं होता, लेकिन व्यावहारिक और कानूनी धरातल पर यह नागरिकता पर अप्रत्यक्ष संकट खड़ा कर सकता है। यह सब इसलिए कि संविधान में ‘वोट देने का अधिकार’ एक मौलिक व लोकतांत्रिक पहचान है। जब किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से हट जाता है, तो राज्य की नज़र में उसकी सक्रिय नागरिक के रूप में पहचान खत्म या संदिग्ध हो जाती है।

वोटर आईडी को भारत में किसी व्यक्ति के ‘स्थानीय निवासी’ और ‘नागरिक’ होने का सबसे बड़ा और सर्वमान्य सरकारी दस्तावेज माना जाता है। अगर वोटर लिस्ट में ही नाम नहीं रहेगा, तो वोटर आईडी कार्ड की प्रासंगिकता और प्रामाणिकता खत्म हो जाती है, जिससे अन्य प्रशासनिक कार्यों में पहचान साबित करना मुश्किल हो जाता है। ऐसे समय  में जब भी देश या किसी राज्य में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर या गहन नागरिकता जांच की प्रक्रिया शुरू होती है, तो ऐतिहासिक वोटर लिस्ट (1951, 1971 या पिछले दशकों की मतदाता सूचियां) को ही नागरिकता और साबित करने का प्राथमिक ‘लिंकेज डॉक्यूमेंट’ माना जाता है। यदि एसआईआर (SIR) जैसी प्रक्रियाओं के तहत लगातार नाम कटते रहें, तो भविष्य में नागरिकता के दस्तावेजों का चक्रव्यूह खड़ा हो सकता है।

असम जैसे राज्यों का अनुभव बताता है कि जिन लोगों के नाम तार्किक विसंगतियों (या दस्तावेजों की कमी के कारण मतदाता सूची से हटाए गए, उन्हें अक्सर ‘संदिग्ध नागरिक’ मान लिया गया। इसके बाद उन्हें अपनी नागरिकता साबित करने के लिए विदेशी न्यायाधिकरणों या अदालतों के चक्कर काटने पड़े। नागरिकता का सीधा संबंध राज्य द्वारा मिलने वाले अधिकारों से है। वोटर लिस्ट से नाम कटने का मतलब है कि नागरिक के रूप में आपकी गिनती कमजोर हो रही है, जिससे राशन, आवास और सामाजिक कल्याणकारी योजनाओं का लाभ मिलने में बाधा आ सकती है। कुल मिलाकर देखें तो वोट कटने से तुरंत नागरिकता खत्म नहीं होती, लेकिन यह किसी वैध नागरिक को “कागजी तौर पर संदिग्ध” बना देता है, जिससे उसे अपनी नागरिकता दोबारा साबित करने की लंबी थकाने वाली कानूनी जंग लड़नी पड़ सकती है

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