
उत्तराखंड में चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान मतदाता सूची से बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने के आरोपों को लेकर दायर जनहित याचिका पर उत्तराखंड हाईकोर्ट ने सुनवाई करते हुए इसे निस्तारित कर दिया है। अदालत ने कहा कि SIR से जुड़ा मामला पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। ऐसे में शीर्ष अदालत के निर्णय से पहले इस विषय पर हाईकोर्ट की ओर से किसी तरह की टिप्पणी या हस्तक्षेप उचित नहीं होगा।
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हल्द्वानी निवासी ने HC में दायर की जनहित याचिका
हल्द्वानी निवासी शादाब आलम की ओर से हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि एक ही व्यक्ति की ओर से फॉर्म-7 के माध्यम से करीब छह हजार मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाने के लिए आपत्तियां दर्ज कराई गई हैं। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि क्षेत्र में सालों से रह रहे मूल लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए जा रहे हैं, जबकि कई कथित फर्जी अथवा बाहरी लोगों के नाम अभी भी मतदाता सूची में बने हुए हैं।
याचिका में की थी निष्पक्ष जांच कराने की मांग
याचिका में पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की गई थी। इसके साथ ही गलत तरीके से आपत्तियां दाखिल करने वाले लोगों के खिलाफ कार्रवाई और मामले में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करते हुए उनके खिलाफ कानूनी कदम उठाने की मांग भी अदालत से की गई थी।
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष लंबित है मामला: HC
मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने की। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR से संबंधित मामला पहले से ही सुप्रीम कोर्ट के समक्ष लंबित है। ऐसे में जब शीर्ष अदालत इस विषय पर सुनवाई कर रही है, तब हाईकोर्ट द्वारा समान विषय पर अलग से कोई टिप्पणी करना या हस्तक्षेप करना उचित नहीं होगा।
अदालत की टिप्पणी के बाद याचिकाकर्ता की ओर से याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी गई। साथ ही यह स्वतंत्रता मांगी गई कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद यदि आवश्यकता महसूस हो तो वह दोबारा हाईकोर्ट का रुख कर सकें। खंडपीठ ने याचिका वापस लेने की अनुमति प्रदान कर दी और इसी के साथ जनहित याचिका का निस्तारण कर दिया।
HC ने नहीं की अंतिम टिप्पणी
हाईकोर्ट के फैसले का सीधा अर्थ यह है कि फिलहाल अदालत ने मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के आरोपों के गुण-दोष पर कोई अंतिम टिप्पणी नहीं की है। SIR से जुड़े व्यापक मुद्दे पर अब सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई और उसके निर्णय पर आगे की स्थिति निर्भर करेगी। शीर्ष अदालत के फैसले के बाद मामले से जुड़े पक्ष आवश्यकता के अनुसार आगे कानूनी कदम उठा सकेंगे।

