दिल्ली हाई कोर्ट भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) में बिना सहमति के अप्राकृतिक यौन संबंध के लिए प्रावधान न होने पर दायर जनहित याचिका पर विचार करेगा। कोर्ट …और पढ़ें
नई दिल्ली। भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) में बिना सहमति के अप्राकृतिक यौन संबंध के लिए प्रविधान न करने के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट विचार करेगा। मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय व न्यायमूर्ति तेजस कारिया की पीठ ने कहा कि डेढ़ साल बीत जाने के बाद भी इस मुद्दे पर केंद्र सरकार का फैसला कहीं नजर नहीं आ रहा है। अप्राकृतिक यौन संबंध के लिए भारतीय दंड संहिता की धारा- 377 का प्रविधान था, जिसे भारतीय न्याय संहिता में उक्त प्रविधान को रद कर दिया गया था।
अप्राकृतिक यौन संबंध के मामलों में कानूनी सुरक्षा
अगस्त 2024 में उक्त अपराध के लिए बीएनएस में प्रविधान करने की मांग वाली याचिकाकर्ता गंतव्य गुलाटी की याचिका निपटारा कर दिया था। अदालत ने केंद्र सकरार से कहा था कि याचिका को एक प्रतिवेदन के तौर पर लेकर जल्द से जल्द और हो सके तो छह महीने के भीतर फैसला लेने काे कहा था। याचिकाकर्ता ने कहा कि एलजीबीटीक्यू समुदाय के सदस्यों को बिना सहमति के अप्राकृतिक यौन संबंध के मामलों में कानूनी सुरक्षा की आवश्यकता है।
अगली सुनवाई मई माह में
पीठ ने कहा कि प्रतिवेदन पर विचार करने और फैसला लेने का निर्देश कोर्ट ने 28 अगस्त, 2024 को जारी किया था। डेढ़ साल की अवधि को कोई भी फैसला लेने के लिए एक उचित समय माना जा सकता है, लेकिन फैसला कहीं नजर नहीं आ रहा है। पीठ ने कहा कि उक्त तथ्यों को देखते हुए रिट याचिका को बहाल किया जाता है।
साथ ही पीठ ने केंद्र सरकार को चार सप्ताह के अंदर हलफनामा दाखिल कर यह बताने को कहा गया कि अदालत के पूर्व निर्देश का पालन सुनिश्चित करने के लिए उसने क्या कदम उठाए हैं। मामले पर अगली सुनवाई मई माह में होगी।
समग्र दृष्टिकोण अपनाते हुए फैसला में समय लगेगा
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने पीठ को बताया कि यह याचिका एक संवेदनशील मुद्दा उठाती है और इस पर संबंधित पक्षों से राय मांगी गई है। यह भी कहा कि इस मामले पर एक समग्र दृष्टिकोण अपनाते हुए फैसला लेने में कुछ समय लगेगा।
गंतव्य गुलाटी ने याचिका में कहा कि बीएनएस में आइपीसी की धारा 377 के बराबर कोई प्रविधान नहीं है। इसके कारण विशेष रूप से एलजीबीटीक्यू समुदाय अपने ऊपर होने वाले किसी भी अत्याचार के खिलाफ आपराधिक उपचार से वंचित रह गया है।
यह भी कहा कि रद की गई आइपीसी की धारा 377 के तहत दो वयस्कों के बीच बिना सहमति के अप्राकृतिक यौन संबंध, नाबालिगों के साथ यौन गतिविधियां और पशुओं के साथ यौन संबंध बनाने पर सजा का प्रविधान था।
याचिका में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद धारा-377 ने आपसी सहमति से समलैंगिक यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया था और केवल बिना सहमति के यौन संबंधों को ही अपराध माना था।

