हल्द्वानी: सार्वजनिक बैंकिंग व्यवस्था और कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा के लिए बुद्धा पार्क में जुटे अधिकारी-कर्मचारी, केंद्र सरकार से निजीकरण रोकने की मांग

हल्द्वानी। IDBI बैंक के प्रस्तावित निजीकरण के विरोध में बैंक अधिकारियों और कर्मचारियों ने सोमवार को बुद्ध पार्क में जोरदार प्रदर्शन किया। United Forum of IDBI Officers & Employees के आह्वान पर आयोजित इस आंदोलन के तहत 2 और 3 नवंबर को देशव्यापी दो दिवसीय भूख हड़ताल की जा रही है। प्रदर्शनकारियों ने केंद्र सरकार और भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) से बैंक की प्रस्तावित बिक्री तत्काल रोकने तथा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक के रूप में इसकी पहचान बनाए रखने की मांग की।
आंदोलन को उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रवक्ता दीपक बलूटिया ने समर्थन दिया। इसके अलावा AIBOC के अध्यक्ष गौरव जोशी, UFBU के अध्यक्ष रोहित वर्मा और ओम प्रकाश सहित विभिन्न बैंक यूनियनों के प्रतिनिधियों ने भी प्रदर्शन स्थल पर पहुंचकर कर्मचारियों की मांगों का समर्थन किया। AIIDBIOA के महासचिव पीयूष कुमार मौर्य और कार्यकारिणी सदस्य गगन यादव ने भी संबोधित कर आंदोलनकारियों का उत्साह बढ़ाया।
संसद में दिए गए आश्वासन का मुद्दा उठाया
प्रदर्शनकारियों ने कहा कि IDBI बैंक ने छह दशकों से अधिक समय तक देश के औद्योगिक और आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। कर्मचारियों ने वर्ष 2003 में तत्कालीन वित्त मंत्री जसवंत सिंह द्वारा संसद के दोनों सदनों में बैंक में कम से कम 51 प्रतिशत सरकारी हिस्सेदारी बनाए रखने के संबंध में दिए गए आश्वासन का हवाला देते हुए सवाल उठाया कि प्रस्तावित निजीकरण के बीच इस प्रतिबद्धता का क्या होगा।
उन्होंने संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति की 46वीं रिपोर्ट का भी उल्लेख किया, जिसमें सरकारी हिस्सेदारी 51 प्रतिशत से कम नहीं रखने की सिफारिश किए जाने की बात कही गई। कर्मचारियों ने मांग की कि बैंक के भविष्य से जुड़े निर्णयों में संसदीय जवाबदेही और सार्वजनिक हित को प्राथमिकता दी जाए।
बैंक के पुनरुद्धार के बाद निजीकरण पर सवाल
कर्मचारी नेताओं का कहना है कि IDBI बैंक ने वित्तीय संकट और भारतीय रिजर्व बैंक की प्रॉम्प्ट करेक्टिव एक्शन (PCA) व्यवस्था के कठिन दौर का सामना किया था। उनके अनुसार, सरकार, LIC और बैंक कर्मचारियों के योगदान से बैंक की वित्तीय स्थिति में सुधार हुआ और उसने लाभप्रदता हासिल की।
ऐसे में कर्मचारियों ने सवाल उठाया कि जब सार्वजनिक संसाधनों और कर्मचारियों के प्रयासों से बैंक की स्थिति मजबूत हुई है, तो अब इसका नियंत्रण निजी निवेशकों को सौंपने की आवश्यकता क्यों है।
कर्मचारियों के अधिकारों और आरक्षण नीति पर जताई चिंता
प्रदर्शनकारियों ने आशंका जताई कि निजीकरण के बाद कर्मचारियों की सेवा शर्तों, पेंशन, कल्याणकारी सुविधाओं और सरकारी आरक्षण नीतियों पर असर पड़ सकता है। उन्होंने बैंक की परिसंपत्तियों, जमाकर्ताओं के हितों और देश की बैंकिंग व्यवस्था पर संभावित प्रभावों को लेकर भी पारदर्शिता की मांग की।
कर्मचारियों ने कहा कि सरकारी निर्णयों में संविधान के अनुच्छेद 14, 38 और 39 की भावना के अनुरूप निष्पक्षता, सामाजिक-आर्थिक न्याय और सार्वजनिक हित सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
ये हैं कर्मचारियों की पांच प्रमुख मांगें
आंदोलनकारियों ने IDBI बैंक की प्रस्तावित बिक्री पर तत्काल रोक लगाने, बैंक में केंद्र सरकार की न्यूनतम 51 प्रतिशत हिस्सेदारी बनाए रखने और जमाकर्ताओं के हितों की सुरक्षा के लिए सॉवरेन गारंटी देने की मांग की। इसके साथ ही मौजूदा कर्मचारियों की सेवा शर्तों, पेंशन और कल्याणकारी सुविधाओं की लिखित गारंटी देने तथा नियुक्तियों के सार्वजनिक क्षेत्र के चरित्र की रक्षा करने की मांग भी उठाई।
देशव्यापी आंदोलन जारी रखने का ऐलान
यूनाइटेड फोरम के आह्वान पर 2 और 3 नवंबर को देशभर में आयोजित भूख हड़ताल के माध्यम से बैंक अधिकारी और कर्मचारी अपनी एकजुटता प्रदर्शित कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों ने स्पष्ट किया कि उनका आंदोलन केवल नौकरी और सेवा शर्तों तक सीमित नहीं है, बल्कि सार्वजनिक बैंकिंग व्यवस्था, संसदीय जवाबदेही, सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय आर्थिक संप्रभुता की रक्षा से भी जुड़ा है।
कर्मचारियों ने केंद्र सरकार से निजीकरण की प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाने और संसद, बैंक कर्मचारियों तथा आम जनता के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग की।


