भारतीय राजनीति के फलक पर दशकों तक अपनी सियासत और अनूठे अंदाज से उत्तर भारत से लेकर देश की राजधानी तक के सियासी समीकरणों को हिला देने वाले कांग्रेस पार्टी के दिग्गज और कद्दावर नेता हरीश रावत का नाम एक बार फिर सुर्ख़ियों के सबसे केंद्र में आ गया है। उत्तराखंड की राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले हरीश रावत के बयानों और हालिया सियासी उठापटक ने एक बार फिर कांग्रेस पार्टी के भीतरखाने मची हलचल को सार्वजनिक कर दिया है, जिससे राजनीतिक गलियारों में भूचाल आ गया है। अपने तीखे तेवर, जनता के बीच जबरदस्त पकड़ और पहाड़ी अंदाज के लिए मशहूर हरीश रावत ने अपने हालिया बयानों में यह साफ कर दिया है कि भले ही समय के साथ पार्टी के भीतर परिस्थितियां बदली हों और उनके वैचारिक या सांगठनिक मतभेद सामने आए हों, लेकिन कांग्रेस उनके खून और हड्डियों में रची-बसी है। उन्होंने एक भावनात्मक और बेहद असरदार बयान देते हुए यहां तक कह दिया कि वे कांग्रेस पार्टी के विचारों और उसके झंडे को इस जन्म से लेकर अपनी अंतिम सांस तक नहीं छोड़ेंगे, और यदि उन्हें इस दुनिया से रुखसत होकर स्वर्ग में भी जाना पड़ा, तो वे कांग्रेस के इस रिश्ते को अपने साथ लेकर जाएंगे। उनके इस बयान ने एक तरफ जहां उनके राजनीतिक विरोधियों को सोचने पर मजबूर कर दिया है, वहीं दूसरी तरफ उनके समर्थकों और पार्टी कार्यकर्ताओं के भीतर एक नया भावनात्मक ज्वार पैदा कर दिया है।
हरीश रावत के राजनीतिक सफर के वे अनछुए पन्ने, जिन्होंने उत्तराखंड से लेकर दिल्ली तक लिख दी नई इबारत
उत्तराखंड के पिथौरागढ़ और कुमाऊं की पथरीली पहाड़ियों से अपनी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत करने वाले हरीश रावत ने शून्य से शिखर तक का वह सफर तय किया है, जिसे आज भी राजनीति के छात्र और शोधार्थी एक मिसाल के रूप में देखते हैं। युवा कांग्रेस के दिनों से लेकर केंद्रीय मंत्रिमंडल में मंत्री पद और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने का उनका यह सफर किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं रहा है, जिसमें संघर्ष, समझौते, मात और जीत के अनगिनत अध्याय दर्ज हैं। जब भी उत्तराखंड राज्य निर्माण की बात आती है, तो उसमें हरीश रावत के योगदान को कभी नकारा नहीं जा सकता, क्योंकि उन्होंने क्षेत्रीय जनता की भावनाओं को दिल्ली के दरबार तक पहुंचाने में एक सेतु का काम किया था। कांग्रेस पार्टी के बुरे से बुरे वक्त में भी जब बड़े-बड़े दिग्गज पार्टी का साथ छोड़कर किनारा करने लगे थे, तब हरीश रावत ने पार्टी के वफादार सिपाही की तरह हर फ्रंट पर मोर्चा संभाला और संगठन को मजबूती देने का काम किया। उनके इसी लंबे और उतार-चढ़ाव से भरे राजनीतिक जीवन के कारण ही आज जब वे पार्टी के भीतर किसी बात को लेकर अपनी असहमति जताते हैं या कोई कड़ा कदम उठाते हैं, तो पूरा देश और मीडिया जगत उनकी हर एक बात को बेहद गंभीरता से सुनता और समझता है।
कांग्रेस पार्टी के साथ वैचारिक और भावनात्मक जुड़ाव, हरीश रावत के बयानों के गहरे सियासी मायने
राजनीति की दुनिया में अक्सर यह कहा जाता है कि नेता अपनी सुविधा और कुर्सी के हिसाब से दल बदलते हैं, लेकिन हरीश रावत जैसे पुराने और जमीनी नेताओं का अपनी पार्टी के साथ जुड़ाव वैचारिक प्रतिबद्धता का एक ऐसा उदाहरण है जो आज के दौर में बेहद दुर्लभ होता जा रहा है। अपने राजनीतिक जीवन के दौरान कई बार ऐसा वक्त भी आया जब उन्हें अपनों से ही अपनों के खिलाफ लड़ना पड़ा, टिकट बंटवारे से लेकर सत्ता के गलियारों में उन्हें किनारे करने की कोशिशें हुईं, लेकिन उन्होंने कभी भी पार्टी की मूल विचारधारा से समझौता नहीं किया। उनके द्वारा यह कहना कि कांग्रेस उनके खून और हड्डियों में है, इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि वे केवल एक राजनीतिक दल के सदस्य नहीं हैं, बल्कि वे उस विचार के वाहक हैं जिसने स्वतंत्रता संग्राम से लेकर आधुनिक भारत के निर्माण तक में अपनी एक अमिट छाप छोड़ी है। वर्तमान समय में जब कांग्रेस पार्टी देश भर में अपने पुनरुत्थान के लिए संघर्ष कर रही है और तमाम राज्यों में आंतरिक कलह से जूझ रही है, ऐसे समय में हरीश रावत जैसा अनुभवी और कद्दावर नेता यदि इस तरह की भावनात्मक और मजबूत प्रतिबद्धता जताता है, तो यह पार्टी के मनोबल को ऊंचा उठाने का काम करता है।
उत्तराखंड की सियासत का भविष्य और हरीश रावत के मार्गदर्शन का कांग्रेस के लिए महत्व
आने वाले दिनों में उत्तराखंड की राजनीति और आगामी चुनावों के मद्देनजर हरीश रावत की यह भूमिका और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि राज्य के हर कोने में उनकी व्यक्तिगत पकड़ और हर जाति-वर्ग के लोगों के बीच उनकी जो स्वीकार्यता है, उसका मुकाबला करना किसी भी विरोधी दल के लिए आसान नहीं रहा है। राज्य की भौगोलिक परिस्थितियों, वहां के स्थानीय मुद्दों और हर एक गांव की नब्ज को जितनी गहराई से हरीश रावत समझते हैं, उतना शायद ही प्रदेश के किसी अन्य नेता के पास वह अनुभव हो। यही कारण है कि कांग्रेस पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व भी भली-भांति इस बात को समझता है कि हरीश रावत को साथ लेकर चलना और उनके राजनीतिक कौशल का सही दिशा में उपयोग करना पार्टी की सफलता के लिए कितना अनिवार्य है। उनके इस बयान के बाद कि वे कांग्रेस को कभी नहीं छोड़ेंगे, पार्टी के भीतर चल रही कयासबाजियों और अटकलों पर फिलहाल विराम लग गया है, और यह संदेश दूर-दूर तक गया है कि उत्तराखंड में कांग्रेस की रीढ़ अभी भी उतनी ही मजबूत है जितनी दशकों पहले हुआ करती थी।
