
उत्तराखंड की वर्तमान विधानसभा का कार्यकाल पूरा होने में अब महज कुछ ही महीनों का समय शेष रह गया है, लेकिन राज्य के जन प्रतिनिधियों की विकास कार्यों पर निधि खर्च करने की रफ्तार बेहद धीमी बनी हुई है। ग्रामीण विकास आयुक्त कार्यालय द्वारा सूचना के अधिकार (RTI) के तहत उपलब्ध कराई गई एक विस्तृत रिपोर्ट में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि निधायक निधि के खर्च में राज्य के 4 मंत्री मुख्यमंत्री से आगे रहे, जबकि 5 मंत्री उनसे पिछड़ गए। विधायक निधि के खर्च के मामले में उत्तराखंड सरकार के मंत्रिमंडल के प्रदर्शन पर नजर डालें तो मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी अपनी विधायक निधि का 65.61 प्रतिशत खर्च कर पांचवें स्थान पर हैं।
भौगोलिकसंदर्भ
रुड़की विधायक मंत्री प्रदीप बत्रा 77 प्रतिशत खर्च के साथ सबसे आगे
विधायक निधि खर्च में रुड़की विधायक मंत्री प्रदीप बत्रा 77 प्रतिशत खर्च के साथ सबसे आगे हैं। उनके बाद सितारगंज विधायक व मंत्री सौरभ बहुगुणा 72 प्रतिशत खर्च कर दूसरे स्थान पर हैं। चौबट्टाखाल विधायक व कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज 68 प्रतिशत खर्च के साथ मंत्रियों तीसरे स्थान पर हैं। मंत्री खजान दास (राजपुर रोड) 66.11 प्रतिशत खर्च के साथ चौथे स्थान पर तो चंपावत विधायत व मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी 65.61 प्रतिशत खर्च के साथ पांचवें स्थान पर हैं।
मसूरी विधायक मंत्री गणेश जोशी 65.45 प्रतिशत खर्च के साथ छठे स्थान पर हैं। भीमताल विधायक मंत्री राम सिंह कैड़ा 62 प्रतितशत खर्च के साथ सातवें स्थान पर। सोमेश्वर विधायक मंत्री रेखा आर्य 60 फीसद खर्च के साथ आठवें स्थान। नरेन्द्र नगर विधायक मंत्री सुबोध उनियाल 57 प्रतिशत खर्च के साथ नवें स्थान पर तो श्रीनगर से भाजपा विधायक मंत्री डॉ धन सिंह रावत मात्र 37 प्रतिशत खर्च के साथ मंत्रियों में सबसे फिसड्डी यानी दसवें स्थान पर हैं।
राजनीति
विकास कार्यों में तेजी दिखाते हुए जिन विधायकों ने अपनी निधि का सबसे अधिक उपयोग किया है, उनमें दलीय सीमा से परे पर प्रदीप बत्रा से नीचे कई विधायक हैं। जैसे फुरकान अहमद, रवि बहादुर, सरवत करीम, और मदन सिंह बिष्ट की निधि 76 फीसद खर्च, स्व. चन्दन राम दास और महेश सिंह जीना 75 फीसद, उमेश शर्मा, गोपाल सिंह और सुमित हृदयेश व 74 फीसद, ब्रज भूषण गैरोला, आदेश सिंह चौहान (BHEL), अनुपमा रावत, राज कुमार पोरी, मोहन सिंह, डॉ. मोहन सिंह (लालकुआं) और फकीर राम की निधि 73 प्रतिशत खर्च हो चुकी है। इसके अलावा बंशीधर भगत, दीवान सिंह बिष्ट, ममता राकेश, मदन कौशिक, अरविंद पांडे और विधानसभा अध्यक्ष ऋतु खंडूरी जैसे वरिष्ठ नेताओं ने भी 68 प्रतिशत से 72 प्रतिशत के बीच निधि का इस्तेमाल किया है।
विधायक निधि खर्च करने में किशोर का सबसे खराब प्रदर्शन
सबसे चिंताजनक बात यह है कि विधायक निधि का एक बड़ा हिस्सा बिना इस्तेमाल के पड़ा है। विकास निधि खर्च करने के मामले में सबसे सुस्त प्रदर्शन करने वाले विधायकों में प्रदेश में भाजपा के टिहरी विधायक किशोर उपाध्याय मात्र 30 प्रतिशत यानी प्रदेश में सबसे कम खर्च कर पाए हैं। इसके बाद श्रीनगर विधायक व मंत्री डॉ. धन सिंह रावत 37 फीसद, यमकेश्वर की भाजपा विधायक रेणु बिष्ट 44 फीसद, प्रीतम सिंह 51फीसद, कपकोट के भाजपा विधायक सुरेश गड़िया 52 प्रतिशत, लोहाघाट के कांग्रेस विधायक खुशाल सिंह 53 प्रतिशत पर अटके हैं।
राजनीति
ऋषिकेश से भाजपा विधायक प्रेम चन्द्र अग्रवाल 54 प्रतिशत, नेता प्रतिपक्ष व कांग्रेस विधायक यशपाल आर्य एवं घनसाली से भाजपा विधायक शक्ति लाल शाह 55 प्रतिशत खर्च। रानीखेत के भाजपा विधायक प्रमोद नैनवाल 56 प्रतिशत और कैबिनेट मंत्री व नरेंद्र नगर के भाजपा विधायक सुबोध उनियाल, रुद्रप्रयाग के भाजपा विधायक मंत्री भरत सिंह व स्व. शैला रानी महज 57 प्रतिशत विधायक निधि खर्च कर पाए हैं।
कुल मिलाकर देखें तो वर्ष 2022-23 से जून 2026 तक राज्य के विधायकों को जारी की गई कुल विधायक निधि में से मात्र 66 प्रतिशत हिस्सा ही खर्च हो सका है, जबकि 34 प्रतिशत धनराशि बजट में ही अटकी हुई है। काशीपुर निवासी सूचना अधिकार कार्यकर्ता नदीम उद्दीन (एडवोकेट) को उत्तराखंड ग्राम्य विकास आयुक्त कार्यालय की उपायुक्त (प्रशासन) हेमन्ती गुंजियाल से मिली जानकारी के मुताबिक वित्त वर्ष 2022-23 से लेकर 2025-26 के जून माह तक राज्य के विधायकों के लिए कुल 1,66,400 लाख रुपये (1,664 करोड़ रु) की विधायक निधि स्वीकृत व उपलब्ध कराई गई थी। हालांकि, इसमें से जनहित के विकास कार्यों पर अब तक केवल 1,09,129.19 लाख रुपये ही खर्च किए जा सके हैं।
भौगोलिकसंदर्भ
चुनाव से ठीक पहले उठ रहे सवाल
विधानसभा चुनाव और वर्तमान कार्यकाल की समाप्ति करीब होने के कारण आरटीआई से सामने आए ये आंकड़े राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील माने जा रहे हैं। स्थानीय जनता और विपक्ष अब सवाल उठा रहे हैं कि जब बुनियादी सुविधाओं के विकास के लिए बजट उपलब्ध था, तो उसे धरातल पर उतारने में इतनी देरी क्यों हुई?
34 प्रतिशत अनपेक्षित निधि का शेष रह जाना यह दर्शाता है कि प्रशासनिक अमले की सुस्ती या जनप्रतिनिधियों की अनदेखी के कारण कई महत्वपूर्ण जनहित योजनाएं समय पर पूरी नहीं हो सकीं। आने वाले दिनों में यह मुद्दा राज्य की राजनीति में तूल पकड़ सकता है
