देहरादून/हल्द्वानी। उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं मीडिया अध्ययन विद्याशाखा के निदेशक प्रो. राकेश चन्द्र रयाल ने अपने विरुद्ध प्रकाशित एक समाचार को असत्य, एकपक्षीय एवं मानहानिकारक बताते हुए संबंधित समाचार पोर्टल को अपने अधिवक्ता के माध्यम से विधिक नोटिस भेजा है। नोटिस में समान प्रमुखता के साथ सार्वजनिक क्षमायाचना प्रकाशित करने तथा 10 लाख रुपये की मानहानि क्षतिपूर्ति देने की मांग की गई है।विधिक नोटिस के अनुसार, 9 जून 2026 को रायपुर, छत्तीसगढ़ से संचालित एक समाचार पोर्टल में प्रकाशित समाचार में प्रो. रयाल के विरुद्ध गंभीर आरोप प्रकाशित किए गए, जबकि उनका कहना है कि समाचार प्रकाशित करने से पूर्व उनका पक्ष जानने अथवा उनसे स्पष्टीकरण प्राप्त करने का कोई प्रयास नहीं किया गया। नोटिस में यह भी कहा गया है कि प्रकाशित सामग्री एक काल्पनिक नाम से कथित शिकायत पर आधारित थी, जिसकी स्वतंत्र तथ्यात्मक पुष्टि किए बिना उसे तथ्य के रूप में प्रस्तुत किया गया।प्रो. रयाल का दावा है कि उनके विरुद्ध सुनियोजित ढंग से भ्रामक सूचनाओं का प्रसार किया जा रहा है। उनके अनुसार, पर्याप्त सत्यापन के अभाव में प्रकाशित सामग्री से उनकी व्यक्तिगत एवं व्यावसायिक प्रतिष्ठा को क्षति पहुँची है।विधिक नोटिस में बिना शर्त समाचार का खंडन, समान प्रमुखता से सार्वजनिक क्षमायाचना प्रकाशित करने, यह स्पष्ट करने कि प्रकाशन से पूर्व उनका पक्ष नहीं लिया गया था तथा कथित प्रतिष्ठागत क्षति के लिए 10 लाख रुपये का मुआवजा देने की मांग की गई है। साथ ही सात दिनों के भीतर मांगों का पालन न होने पर सक्षम न्यायालय में विधिक कार्यवाही प्रारंभ करने की चेतावनी भी दी गई है।नोटिस में यह भी उल्लेख किया गया है कि संबंधित शिकायत में उल्लिखित नामों एवं ई-मेल पहचान को लेकर गंभीर तथ्यात्मक विसंगतियाँ हैं। प्रो. रयाल के अनुसार, विभागीय अभिलेखों में कथित नाम से पत्रकारिता एवं मीडिया अध्ययन कार्यक्रम में कोई छात्रा पंजीकृत नहीं है। इसके अतिरिक्त, विश्वविद्यालय की दूरस्थ शिक्षा प्रणाली के बावजूद कथित शिकायतकर्ता को “नियमित छात्रा” के रूप में प्रस्तुत किया जाना भी भ्रामक बताया गया है।इसी क्रम में प्रो. राकेश चन्द्र रयाल ने विश्वविद्यालय प्रशासन को एक विस्तृत पत्र भेजकर पूरे प्रकरण की निष्पक्ष एवं स्वतंत्र जाँच कराने का अनुरोध किया है। उन्होंने यह प्रश्न भी उठाया है कि यदि कथित शिकायत विश्वविद्यालय को प्राप्त हुई थी, तो जाँच पूरी होने से पहले वह हल्द्वानी, उत्तराखण्ड से रायपुर, छत्तीसगढ़ स्थित समाचार पोर्टल तक कैसे पहुँची और किन माध्यमों से उसका प्रसार हुआ।पत्र में उन्होंने यह भी उल्लेख किया है कि पिछले कई वर्षों से उनके विरुद्ध छद्म पहचान और संदिग्ध तथ्यों पर आधारित शिकायतें तथा सूचना के अधिकार अधिनियम के अंतर्गत विभिन्न आवेदन दायर किए जाते रहे हैं। उनके अनुसार, कुछ मामलों में शिकायतकर्ताओं अथवा आवेदकों के पते संदिग्ध पाए गए और विश्वविद्यालय द्वारा भेजे गए पत्र वापस लौट आए। उन्होंने ऐसे मामलों की भी निष्पक्ष जाँच कर वास्तविक तथ्यों का पता लगाने की मांग की है।प्रो. रयाल ने यह भी अनुरोध किया है कि यदि जांच में किसी व्यक्ति अथवा समूह की भूमिका प्रथमदृष्टया आपराधिक प्रकृति की पाई जाती है, तो संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध विधिसम्मत आपराधिक मामला दर्ज कर आवश्यक कानूनी कार्रवाई की जाए।उन्होंने विश्वविद्यालय प्रशासन से अपने कार्यालय में ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग युक्त सीसीटीवी प्रणाली स्थापित करने, संदिग्ध शिकायतों की सत्यता का परीक्षण कराने तथा आवश्यक सुरक्षा उपाय सुनिश्चित करने का अनुरोध किया है। उनका कहना है कि हालिया घटनाक्रम के बाद उन्हें अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा, व्यावसायिक प्रतिष्ठा तथा परिवार की सुरक्षा को लेकर गंभीर आशंकाएँ उत्पन्न हुई हैं और उन्हें अपने जीवन एवं जान-माल की सुरक्षा का भी खतरा महसूस हो रहा है।उन्होंने यह भी दावा किया कि लगभग एक माह पूर्व कुछ विद्यार्थियों ने उन्हें फोन कर बताया था कि किसी ने उनसे संपर्क कर उनके विरुद्ध माहौल बनाने और उन्हें एकजुट करने का प्रयास किया था। उनके अनुसार, उस समय उन्हें इस बात का अनुमान नहीं था कि उनके खिलाफ ऐसी गतिविधियाँ इतने व्यापक स्तर पर संचालित की जा रही हैं, जिन्हें उन्होंने सामान्य समझकर नजरअंदाज कर दिया।अपने बयान में प्रो. राकेश चन्द्र रयाल ने कहा कि उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय में नियुक्ति के बाद से ही कुछ लोग लगातार उन्हें निशाना बनाते रहे हैं। उनका आरोप है कि एसोसिएट प्रोफेसर/प्रोफेसर पद पर पदोन्नति तथा पत्रकारिता एवं मीडिया अध्ययन विद्याशाखा के निदेशक बनने के बाद विश्वविद्यालय के भीतर के कुछ लोग उनसे खुश नहीं हैं और उन्हें पद से हटाने के उद्देश्य से विभिन्न प्रयास कर रहे हैं।उन्होंने कहा कि यह भी जांच की जाए कि संबंधित समाचार और काल्पनिक नाम से कथित शिकायत विश्वविद्यालय के शिक्षकों, कर्मचारियों एवं अन्य व्यक्तियों तक किस माध्यम से पहुँची, उसे किसने आंतरिक स्तर पर साझा किया तथा बाद में किसके द्वारा व्यापक रूप से प्रसारित किया गया। उन्होंने इस पूरे घटनाक्रम की सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) विशेषज्ञों और साइबर विशेषज्ञों की सहायता से डिजिटल एवं फॉरेंसिक जांच कराने तथा आवश्यकता पड़ने पर साइबर अपराध के पहलुओं की भी जांच किए जाने की मांग की है।उन्होंने यह भी कहा कि उनकी नियुक्ति से संबंधित मामला माननीय उच्च न्यायालय, नैनीताल में विचाराधीन है तथा समय-समय पर उनकी छवि धूमिल करने और मानसिक प्रताड़ना पहुँचाने के उद्देश्य से उनके विरुद्ध समाचार प्रकाशित किए जाते रहे हैं। उन्होंने पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जाँच कर वास्तविक तथ्यों को सार्वजनिक करने तथा दोषी पाए जाने वाले व्यक्तियों के विरुद्ध विधिसम्मत कार्रवाई किए जाने की मांग की है।

