कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संस्थापक और राष्ट्रीय संयोजक अभिजीत दीपके ने मंगलवार को अचानक अपने आंदोलन पर ब्रेक लगाकर हर किसी को चौंका दिया। दीपके ने भले ही त्योहार के मौसम में परिवार के साथ वक्त बिताने की सलाह देते हुए अपने कार्यकर्ताओं (जिन्हें वे ‘कॉकरोच’ कहते हैं) को घर वापस लौटने के लिए कहा है, लेकिन उनकी यह दलील इतनी मजबूत नहीं लग रही कि उठते हुए गंभीर सवालों को रोक सके।
ऐसे में राजनीतिक गलियारों में यह बड़ा सवाल अब भी कायम है कि ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा लिए बिना एक कदम भी पीछे न हटने की कसमें खाने वाले दीपके ने आखिर अचानक अपने कदम क्यों पीछे खींच लिए? इसके पीछे मुख्य रूप से तीन बड़े कारण देखे जा रहे हैं।
अपनों की चोट से पैदा हुआ ‘साजिश’ का डर
अभिजीत दीपके के इस अप्रत्याशित फैसले के पीछे उस कथित चोट की सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है, जो ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन की प्रमुख नेहा बोरा और वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण के बयानों से आंदोलन को पहुंची है। माना जा रहा है कि जिस तरह प्रशांत भूषण और नेहा बोरा ने ‘रेजीम चेंज’ (सत्ता परिवर्तन) और बांग्लादेश के ‘जेन जी’ (Gen Z) आंदोलन से सीख लेने जैसी बातें खुलकर कहीं, उससे सीजेपी के शीर्ष नेतृत्व में यह खौफ पैदा हो गया था कि उनके आंदोलन पर ‘राष्ट्रविरोधी साजिश’ का ठप्पा लग सकता है।
दीपके को संभवतः इस बात की गहरी चिंता सताने लगी थी कि इससे आम जनता के मन में आंदोलन के पवित्र उद्देश्यों को लेकर शक और आशंकाएं बढ़ जाएंगी। इसी वजह से उन्होंने रणनीतिक रूप से फिलहाल इसे स्थगित करना ही बेहतर समझा, ताकि कुछ समय बाद नए सिरे से और साफ छवि के साथ इसकी दोबारा शुरुआत की जा सके।
सह-संयोजकों को जेल से निकालने की फिक्र में चला दांव
राजनीतिक विश्लेषक दीपके की ओर से आंदोलन पर लगाए गए इस ब्रेक को एक सोची-समझी चाल या दांव के रूप में भी देख रहे हैं। माना जा रहा है कि जेल में बंद सौरभ दास और आशुतोष रांका को जल्द से जल्द सलाखों से बाहर लाने के लिए ही उन्होंने सार्वजनिक रूप से ऐसा संदेश दिया है कि फिलहाल वे आंदोलन को रोककर परिवार संग समय बिताने जा रहे हैं।
दरअसल, स्पेशल एग्जीक्युटिव मजिस्ट्रेट की अदालत ने सोमवार को सुनवाई के दौरान साफ कहा था कि उन्हें इस बात का बिल्कुल भरोसा नहीं है कि यदि सौरभ और आशुतोष को रिहा कर दिया जाए, तो वे पिछली बार की तरह कानून-व्यवस्था का उल्लंघन नहीं करेंगे। ऐसे में पूरी संभावना है कि बुधवार की पेशी से ठीक पहले दीपके ने आंदोलन रोकने की घोषणा करके अपने दोनों सह-संयोजकों की जमानत और रिहाई का रास्ता साफ करने की कोशिश की है।
क्या आंदोलन में दिखा ‘अपनों’ का ही भारी अभाव?
अभिजीत दीपके के इस कदम के पीछे एक और बड़ी वजह यह गिनाई जा रही है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के मुद्दे पर कॉकरोच जनता पार्टी को उम्मीद के मुताबिक आम लोगों का समर्थन नहीं मिल रहा था। 10 अक्टूबर को जब संगठन ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर भारी आंदोलन का ऐलान किया था, तब पुलिस के कड़े इंतजामों को चुनौती देने के लिए महज कुछ हजार लोग ही सड़कों पर उतरे। पीटीआई (PTI) की रिपोर्ट के मुताबिक, उस दिन दिल्ली में करीब 7 हजार लोगों को हिरासत में लिया गया था।
अगर इसकी तुलना 20 जुलाई को सीजेपी के ‘संसद चलो’ मार्च से करें, तो उस समय सड़कों पर युवाओं का भारी हुजूम उमड़ा था जिसे संभालना प्रशासन के लिए बेहद मुश्किल हो गया था। इसके अलावा, 16 अक्टूबर को जब कनॉट प्लेस (CP) में ‘लहरा दो तिरंगा’ कार्यक्रम का आयोजन किया गया, तो वहां समर्थकों से ज्यादा विरोध करने वाले लोग ही नजर आए। इसी जनसमर्थन की कमी ने भी दीपके को आंदोलन पर तुरंत ब्रेक लगाने के लिए मजबूर किया होगा।



